حاج أحمد مات.. و هو ينقذ الناس من جور السيل..! بقلم عثمان محمد حسن

حاج أحمد مات.. و هو ينقذ الناس من جور السيل..! بقلم عثمان محمد حسن


08-01-2015, 01:30 PM


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Title: حاج أحمد مات.. و هو ينقذ الناس من جور السيل..! بقلم عثمان محمد حسن
Author: عثمان محمد حسن
Date: 08-01-2015, 01:30 PM

برقٌ.. رعدٌ

مطرٌ.. مطرٌ.. مطرٌ..

ماءٌ.. ماءٌ.. .. ماءٌ.. ماءٌ..!

والناس تحاول سد شقوقٍ يتسرب منها الماءُ

إلى الأكواخِ الطينْ..

ضوضاءٌ.. ضوضاءٌ.. ضوضاءٌ

و امرأةُ تجري من جهةِ التلْ:-

" السيل! السيل! السيلْ!"

كلُّ القريِة تخرجُ عزّ الليلْ..

عويلُ نساءٍ.. وعويلْ..

و الماءُ يمورُ.. يغورُ.. يفورُ..

يفورُ.. يدورُ.. يظل يدورْ..

كالباحثِ عن كنزٍ تحت الأرضْ..

يتفجرُّ فوق الأرضِ العطشى البورْ

يلتفُّ حول بيوتِ الطينْ

و يجرفُ كلَّ بيوتِ الطينْ..

أوانٍ تطفحُ و أباريقْ..

نملٌ يقرصُ.. و عقاربُ تلسعُ.. و ثعابين..

السيل! السيل! السيل!

تَعَدَّي الغولِ على الأحلامِ العرجاءْ..

تتقافذُ كلُّ خِشَاشِ الأرضْ..

وُجهتها دبةُ شيخْ أحمدْ..

القنفذُ يخرجُ من تحت الأرضْ

و الضبُّ يدُّب.. يدُّب.. يدُّبْ..

و البومُ يهبْ..

يستسلمُ للبومِ الضبْ..

للبومِ حضورٌ طاغٍٍ في ليلتِنا الليلاء..

موجاتُُ.. موجاتٌ.. موجاتٌ.. موجاتْ..!

تجتاحُ المدرسةَ و المسجدَ و الدكانْ..

إختلط الزيتُ بالأوراقِ و بالأورادِ و ( كرسي الجانْ)..

إرحمنا يا هذا السيلْ..

أكتافُ القريةِ ما عادت تتحملُ هذا الشيلْ..

و بعد أذانِ الفجرْ,,

لبست شمسُ القريةِ ثوبَ حدادْ

ركاماً.. زبداً.. و غثاءاً و غثاءْ..

و اختنقَ صوتُ حمارِ الشيخْ..

و الديكُ الأخرقُ لم يظهر..

و الحوشُ انفتحَ على الجيرانْ- كلِّ الأركانْ

و رفاتُ بيوتٍ فوق رفاتْ

و حمارُ الشيخْ تحت الأنقاضْ..

" مات؟!!"

"لا..لا.. ما مات..!"

و عويلٌ نساءٍ.. و عويلْ..

"أَحَّيْ أنا!

شيخْ أحمد مات!.. مااااات!"